नीरज गुप्ता की विशेष रिपोर्ट
चरचा कालरी......नगर पालिका परिषद शिवपुर-चरचा में दिसंबर 2026 में होने वाले नगरीय निकाय चुनाव का समय जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे राजनीतिक सरगर्मियां भी तेज होती जा रही हैं। लेकिन इस बार चुनावी तस्वीर का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि प्रमुख राजनीतिक दल भाजपा और कांग्रेस ने अभी तक न तो नगर पालिका अध्यक्ष पद के प्रत्याशी की घोषणा की है और न ही पार्षद प्रत्याशियों की सूची जारी की है। यानी फिलहाल किसी भी दावेदार के पास पार्टी का अधिकृत प्रत्याशी होने का दावा करने का आधार नहीं है। इसके बावजूद दोनों ही दलों के कुछ वरिष्ठ पदाधिकारी अपनी-अपनी पत्नियों को प्रत्याशी के रूप में प्रस्तुत करते हुए समर्थकों के साथ घर-घर दस्तक दे रहे हैं और मतदाताओं से उन्हें जिताने की अपील कर रहे हैं।ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जब संगठन ने प्रत्याशी घोषित ही नहीं किया, तो फिर दावेदार किस हैसियत से स्वयं को प्रत्याशी बताकर वोट मांग रहे हैं? क्या राजनीतिक दलों में संगठन की सहमति और अनुशासन से ज्यादा व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा प्रभावी हो गई है ?
भाजपा में अनुशासन की जगह गुटबाजी का प्रदर्शन!......अन्य राजनीतिक दलों की तुलना में भाजपा को अनुशासित और संगठन आधारित पार्टी माना जाता है, लेकिन शिवपुर-चरचा के मौजूदा चुनावी घटनाक्रम में पार्टी की यह छवि कुछ कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है। नगर पालिका अध्यक्ष पद के लिए पूर्व अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष श्रीमती कुंती चक्रधारी लगभग 10 वर्षों के अंतराल के बाद एक बार फिर चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी में हैं। उनके द्वारा महिला सहयोगियों के साथ घर-घर जनसंपर्क कर मतदाताओं से समर्थन मांगा जा रहा है।वहीं नगर पालिका उपाध्यक्ष राजेश सिंह भी अपनी पत्नी श्रीमती दीपा राजेश सिंह और समर्थकों के साथ वार्डों का भ्रमण कर घर-घर पहुंच रहे हैं। इस दौरान मतदाताओं से अपनी पत्नी को अध्यक्ष पद का प्रत्याशी बताते हुए जिताने का अनुरोध किया जा रहा है।
लेकिन दिलचस्प बात यह है कि भाजपा जिला संगठन कोरिया ने अभी तक इन दोनों में से किसी भी नाम पर अधिकृत प्रत्याशी के रूप में मुहर नहीं लगाई है। इतना ही नहीं, भाजपा मंडल अध्यक्ष श्रीमती दीपा विश्वकर्मा और वार्ड क्रमांक 5 की पार्षद श्रीमती रामकली पाल एवं श्रीमति डेजी सिंह ने भी अध्यक्ष पद के लिए अपनी दावेदारी प्रस्तुत करते हुए आवेदन किया है। श्रीमती रामकली पाल भी अपने स्तर पर जनसंपर्क में जुटी हुई हैं।इस प्रकार भाजपा में अध्यक्ष पद के कई दावेदार अलग-अलग टीम बनाकर अपनी-अपनी जीत की जमीन तैयार करने में लगे हैं। जबकि राजनीतिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो प्रत्याशी घोषित होने तक सभी दावेदारों को एकजुट होकर संगठन के साथ चलना चाहिए और व्यक्तिगत प्रचार के बजाय कमल फूल के चुनाव चिह्न को विजयी बनाने के लिए मतदाताओं से अपील करनी चाहिए।
क्योंकि अंततः पार्टी इनमें से किसी एक को ही अपना अधिकृत प्रत्याशी बनाएगी। ऐसे में शेष दावेदारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठन के निर्णय को स्वीकार करने की होगी। टिकट नहीं मिलने की स्थिति में यदि कोई दावेदार नाराज होकर निष्क्रिय होता है अथवा अप्रत्यक्ष रूप से संगठन के चुनावी समीकरणों को प्रभावित करता है, तो इसका खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ सकता है।
सोशल मीडिया पर प्रचार ज्यादा, संगठन की चिंता कम!......
शिवपुर-चरचा में भाजपा की आंतरिक गुटबाजी अब राजनीतिक चर्चाओं का विषय बनती जा रही है। दावेदारों के अलग-अलग जनसंपर्क अभियान और सोशल मीडिया पर लगातार अपलोड हो रही प्रचार सामग्री से भी यह स्पष्ट नजर आता है कि हर कोई अपनी दावेदारी को मजबूत दिखाने में लगा है। स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि कुछ दावेदारों की टीमों द्वारा वार्ड पार्षद का प्रत्याशी बनाए जाने का आश्वासन देकर भी अपने पक्ष में समर्थन जुटाने की कोशिश की जा रही है।ऐसे में सवाल यह है कि क्या जिला भाजपा संगठन इन गतिविधियों से अनजान है? सोशल मीडिया के इस दौर में जब प्रत्येक जनसंपर्क कार्यक्रम, बैठक और राजनीतिक गतिविधि सार्वजनिक हो रही है, तब संगठन की निगाहों से ये गतिविधियां कैसे बच सकती हैं? आखिर जिला भाजपा अध्यक्ष किस रणनीति के तहत इन अलग-अलग गुटों को एक मंच पर लाकर पार्टी की एकजुटता सुनिश्चित करेंगे?
कांग्रेस भी भाजपा से पीछे नहीं, यहां भी अलग-अलग चुनावी दुकानें!.....
स्थानीय भाजपा की कार्यशैली के समानांतर कांग्रेस के दावेदार भी कुछ इसी अंदाज में चुनावी तैयारी करते नजर आ रहे हैं। नगर पालिका शिवपुर-चरचा अध्यक्ष पद के लिए कांग्रेस से श्रीमती लालमुनि यादव, श्रीमती अंशु लकड़ा, श्रीमती नीता पंकज मिश्रा, श्रीमती पद्मावती यादव और श्रीमती नम्रता सिंह सहित कुल पांच महिला दावेदारों ने अपनी दावेदारी प्रस्तुत की है।इन पांचों दावेदारों की राजनीतिक एकजुटता फिलहाल केवल पार्टी के कार्यक्रमों तक ही सीमित दिखाई देती है। चुनावी जनसंपर्क की बात आती है तो सभी की अपनी-अपनी टीम और अलग-अलग रणनीति नजर आती है। इनमें श्रीमती नीता पंकज मिश्रा, श्रीमती लालमुनि यादव और श्रीमती अंशु लकड़ा का जनसंपर्क एवं प्रचार-प्रसार विशेष रूप से चर्चा में है।
गौरतलब है कि कांग्रेस संगठन ने भी अभी तक अध्यक्ष पद के प्रत्याशी की आधिकारिक घोषणा नहीं की है। इसके बावजूद सभी दावेदार अपने-अपने स्तर पर मतदाताओं से अध्यक्ष पद के लिए समर्थन मांग रहे हैं। ऐसे में यह सवाल कांग्रेस संगठन के सामने भी खड़ा है कि जब प्रत्याशी का निर्णय अभी होना बाकी है, तब दावेदारों को अलग-अलग प्रचार अभियान चलाने की अनुमति किस आधार पर मिल रही है?कांग्रेस के पांचों दावेदारों को भी प्रत्याशी की घोषणा होने तक एकजुट होकर पार्टी के पक्ष में जनसंपर्क करना चाहिए। क्योंकि टिकट की दौड़ में शामिल प्रत्येक दावेदार की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा यदि संगठन की सामूहिक रणनीति पर भारी पड़ती है, तो इसका सीधा नुकसान पार्टी को उठाना पड़ सकता है।
शिवपुर-चरचा के मौजूदा राजनीतिक घटनाक्रम में पत्नी प्रेम बेहद ज्यादा नजर आ रहा है, कार्यकर्ताओं व अन्य लोगों को संगठन का पाठ पढ़ने वाले पत्नी प्रेम के आगे नतमस्तक हो गए सबसे बड़ा सवाल यही है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दलों में अध्यक्ष पद के इतने दावेदार होने के बावजूद संगठनात्मक एकजुटता का अभाव क्यों दिखाई दे रहा है? आखिर प्रत्याशी घोषित होने से पहले ही व्यक्तिगत स्तर पर जीत-हार का माहौल क्यों बनाया जा रहा है?राजनीति में दावेदारी करना प्रत्येक कार्यकर्ता का अधिकार है, लेकिन पार्टी का अधिकृत प्रत्याशी घोषित होने से पहले स्वयं को प्रत्याशी के रूप में प्रस्तुत करना और मतदाताओं से व्यक्तिगत समर्थन मांगना संगठन की सामूहिक रणनीति के लिए चुनौती बन सकता है।
दिसंबर में होने वाले निकाय चुनाव में दोनों ही दलों के सामने केवल प्रतिद्वंद्वी पार्टी को हराने की चुनौती नहीं है, बल्कि अपने ही दावेदारों और उनके समर्थकों को एकजुट रखने की भी बड़ी परीक्षा है। टिकट की घोषणा के बाद जिन दावेदारों को निराशा हाथ लगेगी, उनकी भूमिका पार्टी की जीत में कितनी प्रभावी होगी, यह आने वाला समय बताएगा।अब देखना यह दिलचस्प होगा कि भाजपा जिला अध्यक्ष और कांग्रेस जिला संगठन अपने-अपने दावेदारों को किस रणनीति के तहत एकजुट करते हैं। क्या दोनों दल समय रहते गुटबाजी पर अंकुश लगाकर संगठन की ताकत का प्रदर्शन करेंगे या फिर टिकट की घोषणा से पहले ही शुरू हुई व्यक्तिगत चुनावी महत्वाकांक्षाएं अधिकृत प्रत्याशी के लिए चुनौती बनेंगी?
फिलहाल शिवपुर-चरचा की सियासत में प्रत्याशी घोषित नहीं हुए हैं, लेकिन दावेदारों ने चुनावी मैदान जरूर सजा लिया है। अब देखना यह है कि संगठन की चलेगी या दावेदारों की मनमानी!

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