कोरिया बैकुंठपुर। किसी जिले के विकास की वास्तविक तस्वीर उसके दूरस्थ और दुर्गम गांवों की स्थिति से सामने आती है। प्रशासनिक जिम्मेदारी संभालने वाले अधिकारियों के लिए इन गांवों तक पहुंचना केवल औपचारिक दौरा नहीं, बल्कि जमीनी समस्याओं को समझने और ग्रामीणों की जरूरतों को करीब से जानने का अवसर होता है। कोरिया जिले में भी समय-समय पर पदस्थ रहे कलेक्टरों ने दुर्गम क्षेत्रों तक पहुंचकर अपनी प्रशासनिक सक्रियता का परिचय दिया है। इन दौरों की कुछ तस्वीरें आज भी जिले के प्रशासनिक इतिहास की यादें ताजा करती हैं।
26 सितंबर 2024 को गोयनी पहुंची थीं तत्कालीन कलेक्टर चंदन संजय त्रिपाठी,
कोरिया जिले की पूर्व कलेक्टर श्रीमती चंदन संजय त्रिपाठी 26 सितंबर 2024 को सोनहत क्षेत्र के दूरस्थ गांव गोयनी पहुंची थीं। इस दौरान उन्होंने क्षेत्र का भ्रमण कर स्थानीय परिस्थितियों को करीब से देखा। सामने आई तस्वीर में वे एक छात्रा के साथ स्कूल में शैक्षणिक गतिविधियों का अवलोकन करती दिखाई दे रही हैं। छात्रा दीवार पर बने चित्रों के माध्यम से सब्जियों की पहचान और उनके नाम बताती नजर आ रही है। यह तस्वीर ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा व्यवस्था और बच्चों की सीखने की गतिविधियों को समझने के प्रयास की झलक पेश करती है।
श्याम धावड़े ने बाइक से तय किया था दुर्गम रास्ता,
जानकारी के अनुसार, चंदन संजय त्रिपाठी से पहले कोरिया जिले के कलेक्टर रहे श्याम धावड़े भी दुर्गम क्षेत्र में बाइक से पहुंचने के लिए चर्चा में रहे थे। पहाड़ी और कठिन रास्तों वाले ग्रामीण इलाकों में प्रशासनिक अधिकारियों का पहुंचना आसान नहीं होता। कई बार सड़क और परिवहन सुविधाओं की कमी के कारण अधिकारियों को भी कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है।
आनंदपुर गोयनी पहुंचने वाली तीसरी कलेक्टर बनीं रोक्तिमा यादव,
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वर्ष 1998 से 2026 तक कोरिया जिले में कुल 20 कलेक्टर पदस्थ हुए हैं। इनमें श्रीमती रोक्तिमा यादव आनंदपुर गोयनी पहुंचने वाली तीसरी कलेक्टर बनीं। यह तथ्य इस बात की ओर भी ध्यान आकर्षित करता है कि जिले के कुछ दूरस्थ गांवों तक पहुंचना आज भी प्रशासनिक स्तर पर चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।
शेराडांड पहुंचने का अनुभव भी रहा खास,
कोरिया जिले के पूर्व कलेक्टर विनय लंगहे का भी छत्तीसगढ़ के सबसे छोटे मतदान केंद्रों में शामिल शेराडांड पहुंचने का अनुभव उल्लेखनीय रहा है। इस क्षेत्र तक पहुंचना भी आसान नहीं है। दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद मतदान केंद्र तक पहुंचकर वहां की व्यवस्थाओं का जायजा लेना प्रशासनिक जिम्मेदारी के साथ लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति प्रतिबद्धता को भी दर्शाता है।
दुर्गम गांवों तक प्रशासन की पहुंच बनना जरूरी,
कोरिया जिले के सोनहत और अन्य दूरस्थ वनांचलों में आज भी कई ऐसे गांव हैं, जहां पहुंचने के लिए कठिन रास्तों से गुजरना पड़ता है। ऐसे क्षेत्रों में सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल और अन्य मूलभूत सुविधाओं की स्थिति का नियमित निरीक्षण बेहद जरूरी है। जिला प्रशासन के मुखिया का इन गांवों तक पहुंचना ग्रामीणों में विश्वास पैदा करता है और उनकी समस्याओं को सीधे प्रशासन तक पहुंचाने का माध्यम बनता है।
कलेक्टरों के इन दौरों की तस्वीरें केवल पुराने प्रशासनिक कार्यक्रमों की यादें नहीं हैं, बल्कि यह संदेश भी देती हैं कि जिले का विकास तभी सार्थक होगा, जब विकास की योजनाओं का लाभ मुख्यालय से लेकर अंतिम छोर पर बसे गांवों तक पहुंचेगा। दुर्गम गांवों तक अधिकारियों की पहुंच और वहां की समस्याओं का समाधान ही सुशासन की वास्तविक पहचान है।


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